रविवार, 24 जनवरी 2010

अच्छा लगता है मुझको...

(कभी कभी जिंदगी में कुछ ऐसी चीजें होती हैं जो हमें अच्छी लगती है बस उसी पर ये नजराना)

तेरा पास आना
पास आकर के गुजर जाना
अच्छा लगता है मुझको ।
तेरा नजर मिलाना
नजर मिलाके नजर चुरा जाना
अच्छा लगता है मुझको ।
तेरा मुस्कुराना
मुस्कुराके खामोश रह जाना
अच्छा लगता है मुझको ।
तेरा दूर जाना
दूर जाके अपना प्यार जताना
अच्छा लगता है मुझको ।
तुम्हारा मेरा कोई न होना
कुछ न होकर भी बहुत कुछ होना
अच्छा लगता है मुझको ।
तुम्हें बहुत कुछ है बताना
पर कुछ भी नहीं बताकर के
आंखों से कह देना
अच्छा लगता है मुझको ।
बस और क्या कहूं
इन सब बातों को सोचकर
तन्हा वक्त गुजारना
अच्छा लगता है मुझको।

इस रिश्ते को क्या नाम दूं ?

(कुछ रिश्तों को लेकर अनजान हूं मैं, समझ नहीं आता रिश्तों से जुड़े हर डोर को किस किस नामसे पुकारुं, कभी कभी ऐसा होता है कुछ लोग बनने वाले हर रिश्ते से भी ज्यादा ओहदे के होते हैं तो कुछ मिले रिश्तों के नाम से भी कम की अहमियत रखते हैं, और कुछ तो ऐसे होते हैं जिन्हे रिश्तों की डोर में बांधना मुश्किल हो जाता है और तब जब रिश्ता का नाम समझ में न आए।)

एक किताब है मेरी जिंदगी
जिसमें हैं प्यार के दो लब्ज
नहीं पता मुझे,उन लब्जों को
रिश्तों का कौन सा नाम दूं
एक कहानी की शुरुआत है
तो दूसरा कहानी का अंत
लेकिन जिसने पिरोया है
उन शब्दों से बनती है
एक अनजान परिभाषा
दिल को समझाया कई बार
जिंदगी एक अक्षर पर शुरु नहीं
और न ही एक अक्षर पर खत्म
ये तो एक पूरी किताब है
जिसपर है कई शब्दों का मेल
तो जगह जगह पर लफ्जों का खेल
दिल तो कहता है हमसे बार बार
भावनाओं की दरिया में मत बह
वरना जिंदगी की हर हकीकत से बेखबर
डूब जाएगी तेरी कश्ती
थाम ले तू सच्चाई को
जान ले तू हर डोर को
हर रुख का सामना कर
अपने मन की माना कर
इसे ही तो कहते हैं रिश्तों की दुनिया
जो शुरु कहीं से होती है
तो खत्म कहीं और पर।